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मानव का उत्सर्जन तंत्र | Exretory system of human

शरीर की कोशिकाओं से अपशिष्ट या विषाक्त पदार्थों को बाहर निकालने की क्रियाविधि को उत्सर्जन (Excreation) कहते हैं। मनुष्य के उत्सर्जी अंगो के नाम
उत्सर्जन तंत्र

उत्सर्जन किसे कहते हैं

उत्सर्जन: मानव शरीर में विभिन्न उपापचय क्रियाओं के फलस्वरुप कई प्रकार के अपशिष्ट (Waste) पदार्थों का निर्माण होता है। शरीर की कोशिकाओं से इन अपशिष्ट या विषाक्त पदार्थों को बाहर निकालने की क्रियाविधि को उत्सर्जन (Excreation) कहते हैं। तथा वे अंग उत्सर्जन क्रिया में भाग लेते हैं या सहायता पहुंचाते हैं, उन्हें उत्सर्जी अंग (Excreatory Organs) कहा जाता है।

उत्सर्जन तंत्र के कार्य का वर्णन ‌‌

उपापचय क्रियाओं (Matabolism Process) के फलस्वरुप शरीर में एकत्रित जटिल यौगिकों का विघटन होता है, जिसके फलस्वरूप ऊर्जा मुक्त होती है और कुछ अपशिष्ट पदार्थ (Waste Products) शेष रह जाते हैं। ये अपशिष्ट पदार्थ व्यर्थ होने के साथ-साथ हानिकारक या विषाक्त (Poisonous) भी होते हैं, जो जीवित कोशिका को हानि पहुंचा सकते हैं। इन पदार्थों का शरीर में अधिक समय तक रहने पर उपापचय की क्रियाओं पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है और विभिन्न रोग भी हो सकते हैं। अतः इन अपशिष्ट (Waste) पदार्थों का शरीर से बाहर निष्कासन आवश्यक है।

मानव उत्सर्जन तंत्र के अंग

मनुष्य में उत्सर्जी अंगो को 5 भागों में बांटा गया है -
            • वृक्क (Kidney)
            • फेफड़ा (Lungs)
            • त्वचा (Skin)
            • यकृत (Liver)
            • आंत (Intestine)

• वृक्क - मनुष्य एवं अन्य स्तनधारियों में उत्सर्जित पदार्थों को बाहर निकालने के लिए एक जोड़ी वृक्क (Kidneys) होते हैं। वृक्क (Kidneys) सेब के बीज के आकार के होते हैं। उदरगुहा (Abdominal Cavity) में कशेरुक दंड (Vertebral Column) के दोनों और एक - एक वृक्क (Kidney) स्थित होता है। इसके चारों ओर एक पेरीटोनियम (Peritonium) नामक झिल्ली पाई जाती है। 140 ग्राम भार प्रत्येक किडनी का होता है।

Kidney

मूत्रवाहिनी क्या है

वृक्क (Kidney) को लंबवत (Lengthwise) काटने पर यह 2 भागों में विभाजित हो जाता है। बाहरी भाग जो अपेक्षाकृत पतला होता है, कॉर्टेक्स (Cortex) कहलाता है। जबकि भीतरी मोटा दो तिहाई भाग मेडुला (Medulla) कहलाता है। वृक्क से अंकलंबी तथा संकरी वाहिनी निकलती है, जिसे मूत्रवाहिनी (Ureter) कहते हैं। दोनों ओर की मूत्रवाहिनीयां मूत्राशय (Urinary Bladder) में खुलती है । प्रत्येक वृक्क (Kidney) में लगभग 10 लाख सूक्ष्म नलीकाए (Micro Tubules) होती है, जिन्हें नेफ्रॉन (Nephron) कहते हैं । नेफ्रॉन वृक्क (Kidney) की कार्यात्मक इकाई (Functional Unit of Kidney) होती है।

नेफ्रॉन की संरचना

प्रत्येक नेफ्रॉन में एक छोटी प्यालीनुमा संरचना होती है, जिसे बोमेन संपुट (Bowman's Capsule) कहते हैं। इस बोमेन संपुट से एक सूक्ष्म कुंडलीत नलिका निकलती है जो सीधी होकर वृक्क पेल्विस में प्रवेश करती है। इसके पश्चात यह नलिका चौड़ी होकर एक पास (Loop) बनाती है, जिसे हेनले ऑफ लूप (Henle's Loop) कहते हैं । यह एक बड़ी वाहिनी में खुलती है, जिसे संग्राहक वाहिनी (Collecting Duct) कहते हैं । सभी संग्राहक वाहिनीया वृक्क पेल्विस में खुलती है । वृक्क पेल्विस से एक वाहिनी, जिसे मूत्रवाहिनी (Ureter) कहते हैं, निकलती है जो मूत्राशय (Urinery Bladder) में खुलती है।

नेफ्रान की संरचना

वृक्क में रक्त की आपूर्ति

महाधमनी (Aorta) से वृक्क धमनी (Renal Artery) रक्त को वृक्क के भीतर ले जाती है। प्रत्येक वृक्क में वृक्क धमनी (Renal Artery) प्रवेश करने के बाद अनेक पतली शाखाओं में विभाजित हो जाती है, जिन्हें वृक्क धमनिकाए (Arterioles) कहते हैं। ये वृक्क धमनिकाए (Arterioles) प्रत्येक नेफ्रॉन (Nephron) के बोमेन संपुट (Bowman's Capsule) में प्रवेश करती है, जिसे अभिवाही धमनीका (Afferent Arteriole) कहते हैं। अभिवाही धमनीका (Afferent Arteriole) बार-बार विभाजित होकर महीन केशिकाओं (Capillaries) का एक गुच्छा बनाती है, जिसे केसीकागुच्छ (Glomerulus) कहते हैं। केसीकागुच्छ पुनः संयोजित होकर धमनिका (Efferent Arterioles) बनाती है, जो पुनः संयोजित होकर वृक्क शिरिकाएं (Renal Venules) बनाती है। ये वृक्क शिरिकाएं अंततोगत्वा वृक्क शिरा (Renal Vein) में खुलती हैं। वृक्क शिरा (Renal Vain) वृक्क से रुधिर को इकठ्ठा कर हृदय (Heart) से पुनः वापस ले जाती है। रक्त से उत्सर्जी पदार्थों को हटाने की प्रक्रिया 2 चरणों में संपन्न होती है -

1. निस्यंदन - निस्यंदन (Filtration) की क्रिया केसीकागुच्छ (Glomerulus) में संपन्न होती है । केसीकागुच्छ एक छन्नी की तरह है। प्रत्येक मिनट में लगभग 1 लीटर रक्त, जिसमें 500 - 600 मिलीलीटर प्लाज्मा होता है, केसीकागुच्छ से होकर गुजरता है। उच्च दाब में छनने की क्रिया को अल्ट्राफिल्ट्रेशन (Ultra Filtration) कहते हैं। छने हुए द्रव को निस्यंद (Filtrate) कहते हैं । इस निस्यंदन (Filtration) के कारण रुधिर के बहुत अधिक लाभदायक घटक भी छान लिए जाते हैं, परंतु इसका निदान अगले चरण में हो जाता है। इस प्रकार के चयनात्मक निस्यंदन को जिसमें कुछ पदार्थ छाने जाते हैं और कुछ नहीं डायलिसिस (Dialysis) कहते हैं। प्रत्येक केसीकागुच्छ (Glomerulus) एक डायलिसिस थैली का कार्य करता है।

2. पुनरावशोषण - बोमन संपुट (Boman's Capsule) में छनने के बाद रुधिर नेफ्रॉन के बाहर मौजूद केशिकाओ के जाल से होकर प्रवाहित होता है। नेफ्रॉन (Nephron) की विभिन्न प्रकार नलिकाओं से गुजरते समय निस्यंद (Filtrate) में उपस्थित अनेक लाभदायक तत्वों को नलिकाओं के चारो ओर मौजूद रुधिर कोशीकाओ (Blood Cells) द्वारा पुनः सोखकर रुधिर में लोटा दिया जाता है। इस क्रिया को पुनरावशोषण (Reabsorption) कहते हैं।

मूत्र कैसे बनता है

नेफ्रॉन या वृक्क नलिका से रुधिर से छनकर आए जल एवम् शेष उत्सर्जी पदार्थों के मिश्रण को मूत्र (Urine) कहते हैं। मनुष्य का मूत्र पारदर्शी और हल्के पीले रंग का द्रव्य होता है। इसका पीला रंग हिमोग्लोबिन के अपघटन से निर्मित यूरोक्रोम (Urochorme) नामक वर्णक (Pigment) के कारण होता है। एक सामान्य व्यक्ति मे 24 घंटे में लगभग 1.5 लीटर मूत्र बनता है। सामान्यतः ताजा मूत्र अम्लीय प्रकृति का होता है। इसका PH मान लगभग 6 होता है।

उत्सर्जी अंगो के नाम

फेफड़ा - मनुष्य में फेफड़े (Lungs) स्वसन तंत्र से संबंधित अंग है, लेकिन यह स्वसन उत्सर्जन (Excretion) का भी कार्य करते हैं। फेफड़ों (Lungs) के द्वारा दो प्रकार के गैसीय पदार्थो कार्बन डाइऑक्साइड एवम् जलवाष्प का उत्सर्जन होता है। कुछ पदार्थ जैसे - लहसुन, प्याज और कुछ मसाले जिनमे कुछ वास्पशिल घटक पाए जाते है का उत्सर्जन (Excreation) फेफड़ों के द्वारा होता है।

त्वचा - त्वचा (Skin) में उपस्थित तेलीय ग्रंथियां (Oil Gland) एवं स्वेद ग्रंथियां (Sweat Gland) क्रमश: सीबम एवं पसीने का स्त्राव करती है। सीबम एवं पसीने के साथ अनेक उत्सर्जी पदार्थ शरीर से बाहर निष्कासित हो जाते है।

यकृत - यकृत कोशिकाएं आवश्यकता से अधिक एमीनो अम्ल तथा रुधिर की अमोनिया को यूरिया में परिवर्तित करके उत्सर्जन (Excreation) में मुख्य भूमिका निभाती हैं। इसके अतिरिक्त यकृत (Liver) तथा प्लीहा कोशिकाए टूटी - फूटी कोशिकाओं को विखंडित कर उन्हे रक्त प्रवाह से अलग करती है। यकृत कोशिकाएं हिमोग्लोबिन का भी विखंडन कर उन्हे रक्त प्रवाह से अलग करती है।

आंत - आंत (Intestine) की दीवार में रुधिर कोशिकाओ का जाल होता है। इन कोशिकाओं के रक्त में विद्यमान अपशिष्ट (Waste) पदार्थ की मात्रा कुछ मात्रा आंत (Intestine) की कोशिकाए अवशोषित करके आंत (Intestine) में पहुंचा देती है। यहा से वे मल के साथ बाहर निकल जाते है। इस प्रकार आंत (Intestine) अपशिष्ट भोजन को शरीर से बाहर निकालकर उत्सर्जन (Excretion) मे मदद करती है।

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