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मानव रोग: रोगों के लक्षण पुष्टिकरण उपचार के विभिन्न तरीकों को समझना

शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य में किसी भी प्रकार के विकास को रोग कहते हैं, अर्थात - अच्छे स्वास्थ्य में रुकावट उत्पन्न होना ही रोग है। रोग के प्रकार
Human Disease, मानव रोग

रोग क्या है

शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य में किसी भी प्रकार के विकार को रोग कहते हैं, अर्थात - अच्छे स्वास्थ्य में रुकावट उत्पन्न होना ही रोग है। दूसरे शब्दों में, शरीर में विकार होना ही रोग (Disease) कहलाता है।

रोग कितने प्रकार के होते हैं

रोगों को उनकी प्रकृति तथा उत्पन्न होने के कारणों के आधार पर दो वर्गों में विभाजित किया गया है -
  • जन्मजात रोग (Congenital Disease)
  • उपार्जित रोग (Acquired Disease)
जन्मजात रोग क्या है
वे रोग जो जन्म से ही शरीर में होते हैं, उन्हें जन्मजात रोग (Congenital Disease) कहते हैं। ये रोग उपापचयी गड़बड़ी या दोषपूर्ण शारीरिक विकास से उत्पन्न होते हैं। इन रोगों का आक्रमण गर्भावस्था के दौरान ही होता है। ओठ का कटना (Harelip), विदीर्ण तालु (Cleft Palate) और पांव का मुड़ा होना (Club Foot) आदि जन्मजात रोग (Congenital Disease) के उदाहरण हैं। जन्मजात रोग निषेचित अंडाणु की गुणसूत्र की संरचना में कमि या गर्भाशय में स्थित शिशु पर आघात पहुंचने के कारण भी होते हैं।

उपार्जित रोग क्या है
वे रोग जो जन्म के पश्चात विभिन्न कारकों के कारण उत्पन्न होते हैं, उन्हें उपार्जित रोग (Acquired Disease) कहते हैं। उपार्जित रोग निम्नलिखित प्रकार के होते हैं ।

संक्रामक या संचारी रोग - यह हानिकारक सूक्ष्मजीवों जैसे - जीवाणु, विषाणु, कवक एवं प्रोटोजोआ आदी के कारण उत्पन्न होते हैं। इन रोगाणुओं का संचरण वायु,जल,भोजन,रोगवाहक कीट तथा शारीरिक संपर्क के द्वारा एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में होता है, इसलिए इन्हें संचरणीय या संक्रामक रोग (Communicable Or Infectious Disease) कहते हैं।

असंक्रामक (असंचरणीय) रोग - वे रोग जो संक्रमित (रोगी) व्यक्ति से स्वस्थ व्यक्ति को स्थानांतरित नही होते,उन्हें असंचरणित अथवा असंक्रामक रोग (Non- Communicable Disease) कहते हैं । इनके उदाहरण निम्न है - मधुमेह, जोड़ो का दर्द,कैंसर,हृदय रोग आदि।

न्यूनता रोग - वे रोग जो कुछ पोषक पदार्थों या विटामिन की कमी के कारण होते हैं उन्हें न्यूनता रोग (Deficiency Disease) कहते हैं।

प्रमुख मानव रोग उनके कारक तथा उनके लक्षण

मानव में होने वाले प्रोटोजोआ जनित रोगों के नाम व कारक ट्रिक

Trick -: प्रोटोजोआ घर - पे का म सो प

पे = पेचिस
का = काला जार या काला रोग
म = मलेरिया
सो = सोने की बीमारी
प = पायरिया

पेचिस - पेचिस एंटअमीबा हिस्टोलिटिका नामक परजीवी द्वारा होने वाला एक रोग है, जो कि सीधे ही मानव आंत (Intestine) को प्रभावित करता है। इस रोग का कोई वाहक नहीं है। यह रोग हो जाने के बाद रोगी व्यक्ति को म्यूकस एवं खून के साथ दस्त, पेट दर्द, बार - बार सोच आना आदि के लक्षण दिखाई पड़ते हैं।

काला जार या काला रोग - काला जार या काला रोग हो जाने पर रोगी व्यक्ति का अस्थि - मज्जा (Bone marrow) प्रभावित होता है। यह रोग लिशमेनिया डोनोवानी नाम के एक परजीवी द्वारा होता है। आमतौर पर इस रोग का वाहक बालू मक्खी को माना जाता है क्योंकि बालू मक्खी के काटने से यह रोग मनुष्य में प्रवेश कर जाता है। इस रोग के पश्चात मनुष्य में तेज बुखार आना, त्वचा का काला पड़ जाना आदि लक्षण देखने को मिलते हैं।

मलेरिया - मलेरिया प्लीहा (Spleen) एवं RBC (Red Blood Cell) को प्रभावित करता है। प्लाज्मोडियम वाइबैक्स नाम के परजीवी द्वारा यह रोग होता है, संक्रमित मादा एनाफिलीज मच्छर का काटना इस रोग का वाहक है, ठंड के साथ बुखार, तेज सर दर्द, अत्यधिक पसीना, जोड़ों में दर्द, आरबीसी की मात्रा घट जाना आदि इस रोग के लक्षण हैं।

सोने की बीमारी - यह बीमारी सीधे ही मस्तिष्क को प्रभावित करती है, ट्रिपेनोसोम ग्रेबियंस इस रोग का परजीवी है। सी सी (Tse - Tse) नामक मक्खी इस रोग का वाहक है। बहुत नींद के साथ बुखार, शारीरिक एवं मानसिक निष्क्रियता, मानसिक असंतुलन आदि इस रोग के लक्षण है।

पायरिया - इस रोग से ग्रसित व्यक्ति के मसूड़े (Gums) प्रभावित होते हैं। एंटीअमिबा जिंजीवेलिश पायरिया का परजीवी है, परंतु इस रोग का कोई वाहक नहीं है। मसूड़े से रक्त का निकलना, मुंह से दुर्गंध आना, आदि इस रोग के प्रमुख लक्षण हैं। इससे बचने के लिए विटामिन सी (Vitamin C) अधिक मात्रा में लेना चाहिए।

मानव में होने वाले जीवाणु जनित रोगों के नाम व कारक ट्रिक

Trick -: पंडित का टिक न्यू है - बेटी रिया

पंडित = प्लेग,डिप्थीरिया,टायफाइड
का = काली खांसी
टिक = टिटनेस, टीबी, ट्रेकोमा, कोठ (कुष्ठ रोग, लिप्रिया/लेप्रोशी)
न्यू = न्यूमोनिया
है = हैजा

प्लेग - यह रोग शरीर के जोड़ वाले भाग को प्रभावित करता है। पाश्चूरेला पेस्टीज (चूहों द्वारा) द्वारा होता है । बहुत तेज बुखार, शरीर पर गिल्टीया और उनमें सूजन आना इसके प्रमुख लक्षण है । प्लेग से होने वाली मृत्यु को 'काली मौत' भी कहा जाता है।

डिप्थीरिया - श्वास नली को प्रभावित करता है। कोरिनोबेक्टीरियम डिप्थेरी नामक जीवाणु द्वारा होता है। सास लेने में तकलीफ, दम घुटना, गले में झिल्ली जेसे पदार्थ का निर्माण होना आदि इसके प्रमुख लक्षण हैं।

टायफाइड - इसे आंत ज्वर के नाम से भी जाना जाता है, क्योंकि यह रोग आंत को प्रभावित करता है। सालमोनेला टाइफी इस रोग का जीवाणु है। तेज बुखार, सिर दर्द, पेट दर्द , आंत ग्रंथियों में सूजन आना इसके प्रमुख लक्षण हैं।

काली खांसी - इसे परट्यूसिस के नाम से भी जाना जाता है, यह रोग स्वसन तंत्र एवं फेफड़ों को प्रभावित करता है। हिमोफिलस परट्यूसिस नामक जीवाणु द्वारा यह रोग उत्पन्न होता है। लगातार खांसी आना इस रोग का प्रमुख लक्षण है जो कि मुख्यतः बच्चों में होता है। इस रोग से बचने के लिए डीपीटी (डिप्थीरिया परट्यूसिस टीबी) का टीका लगाया जाता है।

टिटनेस - यह रोग तंत्रिका तंत्र को प्रभावित करता है, क्लासट्रिडियम टीटेनी नामक जीवाणु द्वारा होता है। तेज बुखार, शरीर में ऐंठन, जबड़ा बंद होना (Lock Jaw), शरीर का धनुष के आकार का हो जाना (धुनुषटंकार) इसके प्रमुख लक्षण है।

कुष्ठ रोग - इसे लेप्रोसी के नाम से भी जाना जाता है, स्वसन तंत्र एवं फेफड़ों को प्रभावित करता है। माइकोबैक्टेरियम लेप्रोसी नामक जीवाणु द्वारा यह रोग होता है। शरीर पर चकत्ते होना, तंत्रिकाए प्रभावित होना इस रोग का प्रमुख लक्षण है। इस रोग से ग्रसित व्यक्ति के उपचार में एम.डी.टी दवाओं का प्रयोग किया जाता है।

न्यूमोनिया - यह रोग फेफड़ों को प्रभावित करता है और न्यूमॉनेटिस जीवाणु द्वारा होता है। सांस लेने में तकलीफ होना इस रोग का प्रमुख लक्षण है।

हैजा - इसे कालेरा के नाम से जाना जाता है, और यह रोग आंत को प्रभावित करता है। विब्रिओ कोलेरा जीवाणु द्वारा यह रोग उत्पन्न होता है। लगातार दस्त और उल्टियां इसके प्रमुख लक्षण हैं, इस रोग से ग्रसित व्यक्ति में जल की कमी हो जाती है, इसलिए अत्यधिक मात्रा में जल का सेवन करना चाहिए।

गोनोरिया - मूत्रमार्ग को प्रभावित करता है, यह रोग निसेरिया गोनोरियाई नामक जीवाणु द्वारा होता है और मूत्रमार्ग में सूजन हो जाना इसका प्रमुख लक्षण हैं।

सिफलिस - जननांग को प्रभावित करता है, ट्रिपनोमा पेलीडम नामक जीवाणु द्वारा होता है। इस रोग से ग्रसित व्यक्ति के जननांगों में घाव हो जाते हैं।

मानव में होने वाले विषाणु जनित रोगों के नाम व कारक ट्रिक

Trick -: रे.खा.ह.मे.ही.पो.ए.चे.छो.ड़.गई

रै - रेबीज
खा - खसरा (Measels)
ह - हर्पीज
में - मेनिनजाइटिस
ही - हिपेटायटिस (पीलिया)
पो - पोलियो
ए - एड्स
चे - चेचक
छो - छोटी माता
ड़ - डेंगू ज्वर
ग - गलसुआ (Mumps)
ई - इंफ्लुएनजा

रेबीज - यह रोग तंत्रिका तंत्र को प्रभावित करता है, ओर रेब्डो वायरस (कुत्ते के काटने से) होता है। सिर दर्द,उल्टी,पानी को देखते ही गले की पेशियों में दर्दनाक ऐंठन,लकवा, रोगी का पागल होना आदि इसके प्रमुख लक्षण हैं। इसे 'हाइड्रोफोबिया' भी कहा जाता है।

खसरा - यह रोग संपूर्ण शरीर को प्रभावित करता है, और मीजल्स वायरस द्वारा उत्पन्न होता है। बुखार, सिरदर्द, श्वास नली में म्यूकस ग्रंथियों में सूजन तथा शरीर पर लाल धब्बे आना इसके प्रमुख लक्षण है।

हर्पीज - यह रोग त्वचा को प्रभावित करता है, और हर्पीज वायरस द्वारा उत्पन्न होता है, त्वचा में सूजन एवं दर्द इस रोग का प्रमुख लक्षण है।

मेनिनजाइटिस - यह रोग मस्तिष्क को प्रभावित करता है और आरबोवायरस द्वारा उत्पन्न होता है। तेज बुखार, सिर दर्द, मस्तिष्क पर पाई जाने वाली झिल्ली में सूजन, मानसिक स्थिति का खराब होना आदि इस रोग के प्रमुख लक्षण हैं।

हेपेटाइटिस - इस रोग को पीलिया के नाम से भी जाना जाता है, और यह यकृत को प्रभावित करता है। ए, बी, नॉन ए, नोन बी नामक विषाणु द्वारा यह रोग उत्पन्न होता है। आंख एवं त्वचा का पीला हो जाना, रक्त में बिलीरुबिन की मात्रा बढ़ जाती है आदि इस रोग के प्रमुख लक्षण है।

पोलियो - यह रोग तंत्रिका तंत्र एवं रीड की हड्डी को प्रभावित करता है। पोलियो वायरस द्वारा यह रोग उत्पन्न होता है। तेज बुखार, सिर दर्द तथा बाद में दुर्बलता, गर्दन में अकड़न, शरीर के किसी एक या अधिक भागों में लकवा होना आदि इस रोग के प्रमुख लक्षण है। पोलियो के टीके की खोज जान सॉल्क ने की थी।

एड्स (AIDS) - इसका पूरा नाम acquired immune deficiency syndrome हैं, इस रोग से पीड़ित व्यक्ति के प्रतिरक्षा प्रणाली में गड़बड़ी हो जाती है । यह रोग HIV (Human Immune Virus) नाम के एक विषाणु द्वारा होता है। रोग प्रतिरोधक क्षमता का नष्ट होना इसका लक्षण हैं, इस रोग से पीड़ित व्यक्ति का एलिशा टेस्ट किया जाता है।

चेचक - इसे स्मॉल पॉक्स के नाम से भी जाना जाता है, यह रोग संपूर्ण शरीर को प्रभावित करता है। और वेरीओला वायरस द्वारा उत्पन्न होता है। तेज बुखार और शरीर पर लाल - लाल दाने निकलना इस रोग के प्रमुख लक्षण हैं।

छोटी माता - इसे चिकन पॉक्स के नाम से जाना जाता है, और यह संपूर्ण शरीर को प्रभावित करता है। यह रोग वेरीसैला वायरस द्वारा उत्पन्न होता है एवं तेज बुखार और त्वचा पर दाने निकलना इस रोग के प्रमुख लक्षण हैं।

डेंगू ज्वर - इसे हड्डी तोड़ बुखार के नाम से भी जाना जाता है, और यह संपूर्ण शरीर को प्रभावित करता है। अरबोवायरस (डेंगू वायरस) (मादा क्यूलेक्स एडीज इजिप्टी मच्छर के काटने से) विषाणु द्वारा उत्पन्न होता है। बुखार, सिर दर्द तथा जोड़ों में दर्द, आंखों तथा पेशियों में दर्द इस रोग के प्रमुख लक्षण है। इस रोग से पीड़ित व्यक्ति के रक्त में प्लेटलेट्स की कमी हो जाती है।

गलसुआ - यह रोग पैरा थायराइड ग्रंथि को प्रभावित करता है और मम्पस वायरस द्वारा उत्पन्न होता है। तेज बुखार, स्वाद कलिकाओ का लाल होना, कान तथा जोड़ों के आसपास की लार ग्रंथियों में सूजन इस रोग के प्रमुख लक्षण है।

इनफ्लुएंजा - यह रोग संपूर्ण शरीर को प्रभावित करता है और मिक्सो वायरस द्वारा उत्पन्न होता है। बुखार, सर्दी, खांसी एवं पेशियों में दर्द इस रोग के प्रमुख लक्षण है।

खनिज तथा विटामिन की कमी से होने वाले रोग

मरास्मस क्वाशियोकर - 1 वर्ष से छोटे शिशु जो स्तनपान की जगह कम पोषक आहार लेते हैं इस रोग से पीड़ित हो जाते हैं। पेशियों का मुड़न, हाथ पैरों का पतला होना, त्वचा पर चकत्ते पड़ना आदि इस रोग के प्रमुख लक्षण है। 5 वर्ष तक के बच्चों में जो मुख्य रूप से कार्बोहाइड्रेट पर निर्भर रहते हैं पीड़ित हो जाते हैं, बच्चे चिड़चिड़े हो जाते हैं, वृद्धि रुक जाती है, वजन कम हो जाता है, पेट निकल आता है।

अरक्तता - इस रोग को एनीमिया के नाम से भी जाना जाता है। और यह रोग लोहा की कमी से उत्पन्न होता है। रक्त में हीमोग्लोबिन की कमी होना, त्वचा का पीला होना, भूख कम लगना तथा जल्दी थक जाना इस रोग का प्रमुख लक्षण है।

हाइपोकेलेमिया - यह रोग पोटेशियम की कमी के कारण उत्पन्न होता है और पोटेशियम की कमी से अत्यधिक उल्टी होने लगती है, हृदय की गति बढ़ जाती है, किडनी क्षतिग्रस्त हो जाती है, कभी-कभी लकवा भी आ जाता है आदि इस रोग के प्रमुख लक्षण है।

हाइपोनेट्रिमिया - यह रोग सोडियम की कमी के कारण उत्पन्न होता है और सोडियम की कमी से निर्जलीकरण एवं रक्त दाब में कमी तथा वजन का कम होना इस रोग का प्रमुख लक्षण है।

घेंघा - इसे ग़वाइटर रोग के नाम से भी जाना जाता है, और यह आयोडीन की कमी के कारण उत्पन्न होता है। थायराइड ग्रंथि का आकार बढ़ना इस रोग का प्रमुख लक्षण है।

हाइपोर्कैल्सीमिया - यह रोग कैल्शियम (Ca) की कमी के कारण उत्पन्न होता है और हड्डियों का कमजोर होना तथा दांतों का कमजोर होना इस रोग का प्रमुख लक्षण है।

रतौंधी - इस रोग को जिरोप्थेलमिया के नाम से भी जाना जाता है। यह रोग विटामिन ए की कमी के कारण उत्पन्न होता है और इस रोग से पीड़ित रोगी की आखें सूझ जाती है। रात को या कम रोशनी में देखने में असमर्थता महसूस होती है आदि इस रोग के प्रमुख लक्षण है। अश्रुग्रंथि आंसुओं का उत्पादन बंद कर देती है ।

बेरी बेरी - यह रोग विटामिन बी की कमी के कारण उत्पन्न होता है इस रोग से पीड़ित व्यक्ति के हाथ पैरों में सूजन आ जाते हैं, अत्यंत दुर्बलता, हृदय गति का बढ़ना एवं सांस फूलना आदि इस रोग का प्रमुख लक्षण है।

पेलेग्रा - यह रोग विटामिन B5 की कमी से उत्पन्न होता है और जीभ के किनारे व नोक सूज जाते हैं, होट के किनारे फट जाते हैं, मसूड़ों तथा शरीर की त्वचा का लाल होना आदि इस रोग का प्रमुख लक्षण है

स्कर्वी - यह रोग विटामिन C की कमी के कारण उत्पन्न होता है, जोड़ों में दर्द, वजन का घटना, मसूड़ों से रक्त आना, दातों का कमजोर होना इस रोग के प्रमुख लक्षण है।

रिकेट्स - इसे ऑस्टियोपोरोसिस रोग के नाम से भी जाना जाता है जो कि विटामिन डी की कमी के कारण उत्पन्न होता है, बच्चों में कैल्शियम की कमी के कारण अस्थियां कमजोर तथा विकृत हो जाती है, वयस्कों में अस्थियों का कमजोर होना तथा उनका आसानी से टूट जाना एवं रीड की हड्डी का मूड जाना इस रोग का प्रमुख लक्षण है।

मुख्य प्रकार के रोग

मधुमेह (Diabetes) - यह अग्नाशय से निकलने वाले हार्मोन इंसुलिन की कमी से होता है । इंसुलिन का पर्याप्त मात्रा में स्त्राव नहीं होने पर यकृत में ग्लाइकोजन की मात्रा धीरे-धीरे समाप्त होने लगती है, और रक्त में ग्लूकोज की मात्रा बढ़ने लगती है और यही बड़ी हुई मात्रा मूत्र के माध्यम से बाहर निकलने लगती है जिसे मधुमेह या डायबिटीज कहा जाता है।

हृदयघात (Heart Attack) - हृदय - धमनिया हृदय की पेशियों को रक्त पहुंचाती है, ह्रदय - धमनियों में रक्त का कोलेस्ट्रोल जम जाने के कारण हृदय की पेशियों को रक्त नहीं मिल पाता है, जिससे हृदय में दर्द होता है और हृदय की धड़कन रुकने लगती है। जिसे हृदय गति का रुक जाना या हृदयाघात या हार्ट अटैक कहा जाता है।

पित ज्वर (Yellow Fever) - यह रोग सामान्यतः दक्षिणी अमेरिका और अफ्रीका में होता है। इस रोग के विषाणु जंगली जानवरों के शरीर में आश्रय लेते हैं, मच्छर इस रोग के विषाणु को मनुष्य के शरीर में पहुंचाते हैं। इस रोग में अचानक ज्वर आ जाता है तथा अत्यधिक सिर दर्द होने लगता है और हड्डियों में दर्द भी होता है कुछ दिनों के बाद भयानक पीलिया रोग हो जाता है तथा रक्त स्त्राव रक्त और पित्त की उल्टी होना आदि लक्षण प्रकट होते हैं

फाइलेरिया (Filaria) - फाइलेरिया रोग अनेक प्रकार के सूत्र कर्मियों (Nimitode) के कारण होता है,जिसमे मुख्य रूप से वुचेरिया ब्रेंकोफ्टी (Wuchereriya Bancrofti) इस रोग से लसीका वाहिनी और ग्रंथियां खुल जाती है जिसे फाइलेरियोसीस कहा जाता है। इसे फिल्मों के नाम से भी जाना जाता है क्योंकि इसमें कभी-कभी पैरों का आकार अत्यधिक बढ़ जाता है मलेरिया की भांति इस रोग के आरंभ में ज्वर आ जाता है।

कैंसर (Cancer) - कोशिकाओं में असामान्य वृद्धि को कैंसर कहते हैं। रेडियोधर्मी पदार्थ जैसे रेडियम,प्लूटोनियम इत्यादि से हड्डी का कैंसर होता है। कैंसर से शरीर के किसी भाग में दर्द न करने वाला पिंड बन जाता है। मुंह से थूक के साथ खून निकलता है।

टिनिएसिस (Taenisis) - इस रोग का कारक टीनिया सोलियम (Taenia Solium) नामक परजीवी है रोगी व्यक्तियों के आंत में इस परजीवी के अंडे उपस्थित होते हैं तथा जब सूअर मानव मल को खाते हैं तो यह सूअर के आंत में पहुंच जाते हैं जहां से यह सूअर के मांस पेशी में पहुंच जाते हैं इसे ब्लेंडर - वर्म (Bladder - Worm) कहते हैं। यदि ऐसे संक्रमित सूअर का अधपका मांस कोई व्यक्ति खाता है तो ब्लेंडर - वर्म उसकी आंत में पहुंचकर टेपवर्म के रूप में विकसित हो जाते हैं । प्रायः टिनिएसिस के लक्षण स्पष्ट रूप से दिखाई नहीं पड़ते केवल कभी-कभी अपच और पेट दर्द होता है, परंतु जब कभी आंत में लार्वा उत्पन्न हो जाता है और केंद्रीय तंत्रिका तंत्र आंखों,फेफड़ों,यकृत व मस्तिष्क में पहुंच जाते हैं, तो रोगी की मृत्यु हो जाती है।

पक्षाघात या लकवा (Hemiplegia) - इस रोग में कुछ ही मिनटों में शरीर के कुछ भागों को लकवा मार जाता है, जहां पक्षाघात होता है वहां की तंत्रिका निष्क्रिय हो जाती है। इसका कारण अधिक रक्त दाब के कारण मस्तिष्क की कोई धमनी का फट जाना अथवा मस्तिष्क को अपर्याप्त रक्त की आपूर्ति होना है। 
साइजोफ्रेनिया (Sehizophrenia) - यह एक मानसिक रोग है जो प्रायः युवा वर्ग में होता है, ऐसा रोगी कल्पना को ही सत्य समझता है वास्तविकता को नहीं ऐसे रोगी आलसी तथा अलगावहीन आलसी लोग होते हैं। 

मिर्गी (Epilepsy) - यह मस्तिष्क के आंतरिक रोगों के कारण होती है, इस रोग में जब दौरा पड़ता है तो मुंह से झाग निकलता है और तो संभल पेशाब भी निकलता है। मिर्गी की औषधि परमिलिया है। जब दौरा पड़ता है तो यह औषधि समय अंतराल को कम करने का कार्य करती है, परंतु इस रोग का कोई सटीक इलाज नहीं है। 

बर्ड फ्लू (Bird Flu) - बर्ड फ्लू पहली बार 1928 में प्रकाश में आया इस रोग का मुख्य विषाणु H5N1 है। यह रोग प्राय: मुर्गियों तथा प्रवासी पक्षियों के माध्यम से प्रसारित होता है वैश्वीकरण के कारण लगभग 8 से 10 वर्षों में यह रोग कई बार दुनिया भर में दहशत फैला चुका है। 

स्वाइन फ्लू (Swine Flu) - स्वाइन फ्लू भी एक संक्रामक रोग है जो की अपना प्रसार काफी तेजी से फैला रहा है, माना जाता है की इस रोग का उद्भव उत्तर अमेरिकी देश मेक्सिको में हुआ विश्व स्वास्थ्य संगठन यानी कि WHO के अनुसार यह संक्रामक रोग अब तक 33 देशों में फैल चुका है। WHO ने स्वाइन फ्लू को इनफ्लुएंजा H1N1 (H = Haemagglutinin & N = Neuraminidase) नाम दिया हैं। बार - बार उल्टी आना, दस्त होना, अचानक तेज बुखार, शरीर में दर्द और थकान का अनुभव होना आदि इस रोग के प्रमुख लक्षण है। इस रोग से बचाव के लिए विशेष टीका या दवा नहीं है, शुरुआती दौर में इस रोग का पता लगने पर इसकी एकमात्र औषधि ओसेलटामिविर काफी कारगर है। मेक्सिको इस रोग से सबसे ज्यादा प्रभावित है 

सार्स (Sars) - सार्स का पूर्ण रूप से क्यूट रेस्पिरेट्री सिंड्रोम है। इस बीमारी के लक्षण फ्लू (Flu) से काफी मिलते-जुलते हैं इस बीमारी के रोकथाम के हेतु अभी कोई कारगर औषधि उपलब्ध नहीं है।

जापानी इन्सेफेलाइटिस (Japanese Encephalitis) - यह रोग क्यूलेक्स प्रजाति के मच्छर के काटने से फैलता है। जापानी इन्सेफेलाइटिस रोग का उद्गम जापान में हुआ इसके बाद में यह एशिया के कई देशों से होते हुए यह रोग कई दशक पहले भारत में भी पहुंचा चुका था, वैसे तो जापानी इन्सेफेलाइटिस (विषाणु) का संक्रमण मच्छर के काटने से होता है, लेकिन सूअर को भी इस रोग का वाहक माना जाता है क्योंकि इस प्रजाति का मच्छर धान के खेतों में पनपता है। यही कारण है कि कारण धान क्षेत्र में हर वर्ष सैकड़ों बच्चे इस रोग की चपेट में आकर अपनी जान गवां बैठते हैं।

इबोला वायरस (Ebola Virus) - इबोला वायरस भी एक संक्रामक बीमारी है। इस वायरस की पहचान सर्वप्रथम 1976 में इबोला नदी के पास में स्थित एक गांव में की गई थी। इसी कारण इसका नाम इबोला पड़ा यह वायरस सबसे पहले अमरीका में पाया गया था। पश्चिम अफ्रीकी देश गिनी, सियेरा, लियोन और नाइजीरिया में इबोला वायरस के संक्रमण से अब तक लगभग 930 लोगों की मौत हो चुकी है। लाइबेरिया ने इस बीमारी के चलते आपातकाल घोषित कर दिया था, इस बीमारी में शरीर की नसों से खून बाहर आना शुरू हो जाता है। जिससे अंदरूनी ब्लीडिंग प्रारंभ हो जाती है। यह एक अत्यंत घातक रोग है जिसमें 90% रोगियों की मृत्यु हो जाती है।

प्रमुख बिंदु
  • ब्लू बेबी रोग बच्चों में नाइट्रेट की अधिकता के कारण होता है।
  • इटाई - इटाई रोग मनुष्यों में कैडमियम की अधिकता के कारण होता है।
  • मिनीमाता रोग पारे (Hg) की अधिकता के कारण होता है। यह रोग सर्वप्रथम जापान में पाया गया था।
  • कैंसर के उपचार में कोबाल्ट 60 तथा गोल्ड 198 का प्रयोग किया जाता है
  • ट्यूमर के उपचार में आर्सेनिक 74 का उपयोग किया जाता है।
  • आयोडीन 131 का उपयोग थायराइड ग्रंथि के उपचार में किया जाता है।
  • सोडियम 24 का उपयोग रक्त प्रवाह की गति संबंधी बीमारी में किया जाता है।
  • फास्फोरस 32 का प्रयोग ल्यूकेमिया के उपचार में किया जाता है।

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