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प्रजनन क्या है | what is reproduction

इस पृथ्वी पर जीव - जातियों की सततता प्रजनन के फलस्वरुप ही संभव हो पाती है। इस प्रकार प्रजनन वह पक्रम है, जिसके द्वारा जीव अपनी ही जैसी अन्य संतानों
प्रजनन तंत्र

प्रजनन क्या है

प्रजनन: जीव जिस प्रकम के द्वारा अपनी संख्या में वृद्धि करते हैं, उसे प्रजनन (Reproductive) कहते हैं। प्रजनन जीवो का सर्वप्रमुख लक्षण है। इस पृथ्वी पर जीव - जातियों की सततता प्रजनन के फलस्वरुप ही संभव हो पाती है। इस प्रकार प्रजनन वह पक्रम है, जिसके द्वारा जीव अपनी ही जैसी अन्य संतानों की उत्पत्ति करता है और इस प्रकार अपनी संख्या में वृद्धि कर अपनी जाति के अस्तित्व को बनाए रखकर उसे विलुप्त होने से बचाता है ।

प्रजनन तंत्र क्या है

जीवो के प्रजनन में भाग लेने वाले अंगों को प्रजनन अंग (Reproductive Organs) तथा एक जीव के सभी प्रजनन अंग को सम्मिलित रूप से प्रजनन तंत्र (Reproductive System) कहते हैं।

मानव प्रजनन तंत्र

मानव एकलिंगी (Unisexual) प्राणी है, अर्थात नर और मादा लिंग अलग-अलग जीवो में पाए जाते हैं । जो जीव केवल शुक्राणु (Sperm) उत्पन्न करते हैं , उसे नर (Male) कहते हैं। जिन जीवो से केवल अंडाणु (Ovum) की उत्पत्ति होती है, उन्हें मादा (Female) कहते हैं। मानव में प्रजनन तंत्र अन्य जंतुओं की अपेक्षा बहुत अधिक विकसित और जटिल होता है। मानव में अंडे का निषेचन (Fertilization) फेलोपियन नलिका (Fallopian Tube) में तथा भ्रुणीय विकास (Emmmbryonic Development) गर्भाशय (Uterus) में होता है। मानव जरायूज (Viviparous) होते हैं, अर्थात यह सीधे शिशु को जन्म देते हैं । मानव में जनन अंग मादा में 12 से 13 वर्ष की उम्र में तथा नर में 15 से 18 वर्ष की उम्र में प्राय: क्रियाशील हो जाते हैं। प्रजनन अंग (Reproductive Organs) भी कुछ हार्मोन (Hormone) का स्त्राव (Secreation) करते हैं, जो शरीर में अनेक प्रकार के परिवर्तन लाते हैं। ऐसे परिवर्तन नर तथा मादा में लैंगिक लक्षणों का विकास करते हैं। मानव में नर तथा मादा प्रजनन अंग पूर्णतया अलग-अलग होते हैं।

नर प्रजनन तंत्र

जनन कोशिका (Reproductive Cell) उत्पादित करने वाले अंग एवं जनन कोशिकाओं को निषेचन के स्थान तक पहुंचाने वाले अंग संयुक्त रूप से नर प्रजनन तंत्र कहलाते हैं। मानव के नर प्रजनन तंत्र में निम्नलिखित लैंगिक अंग एवं उनसे संबंध अन्य रचनाएं पाई जाती हैं -

     • वृषण एवं वृषण कोष (Testes And Scrotal Sac)
     • अधिवर्षण (Epididymis)
     • शुक्रवाहिका (Vas Deferens)
     • शुक्राशय (Vas Vesicle)
     • पूर: स्थ ग्रंथि (Prostate Glands)
     • शिश्न (Penis)

नर प्रजनन तंत्र


वृषण एवं वृषण कोष - वृषण नर जनन ग्रंथियां (Glands) है, जो अंडाकार होती है । इनकी संख्या 2 होती है। वृषण नर में पाया जाने वाला प्राथमिक जनन अंग है । वृषण त्वचा की बनी एक थैली जैसी रचना में स्थित रहते हैं। इसे वृषण कोष (Scrotal Sac) कहते हैं । शुक्राणु (Sperm) उत्पादन के लिए आवश्यक ताप शरीर के ताप से कम होता है। यही कारण है कि वृषण उदर गुहा के बाहर वृषण कोष में स्थित होते हैं।शुक्राणु शरीर में 30 दिन तक जीवित रहते हैं, जबकि शुक्राणु स्त्रियों में केवल 72 घंटे तक जीवित रहते हैं। वृषण (Testes) में एक प्रकार का द्रव भरा रहता है, जिसे वृषण द्रव (Seminal Fluid) कहते हैं। वृषण (Testes) में अंतराली कोशिकाओं (Interstitial cell's) के समूह पाए जाते हैं, जो नर जनन हार्मोन टेस्टोस्टरोन (Testtosterone) का स्त्राव करती हैं। टेस्टोस्टेरोन (Testtosterone) गोन लैंगिक लक्षणों (Secondary Sexual Character) के विकास एवं नियंत्रण में सहायक होता है । वृषण (Testes) से शुक्राणु कोशिकाएं अधिवृषण में चली जाती है, जहां वे संचित रहती है। वृषण का प्रमुख कार्य शुक्राणुओं का निर्माण करना और नर हार्मोन टेस्टोस्टेरोन की उत्पत्ति करना है।     
 
अधिवृषण - यह एक 6 मीटर लंबी कुंडलित नलिका होती है, जो प्रत्येक वृषण के पीछे स्थित होती है। यह वृषण से अच्छी तरह जुड़ी रहती है । इसका एक छोर वृषण से जुड़ा रहता है तथा दूसरा छोड़ आगे बढ़कर शुक्रवाहिका (Vas Deferens) बनाता है। अधिवृषण (Epididymis) शुक्राणुओं के प्रमुख संग्रह स्थान का कार्य करता है। शुक्राणु यही सक्रियता प्राप्त करते हैं।

शुक्रवाहिका - यह एक पतली नलिका होती है, जिसके माध्यम से शुक्राणु अधिवृषण (Epididymis) से शुक्राशय (Vas Vesicle) में पहुंचते हैं। शुक्रवाहिका अधिवृषण को शुक्राशय (Vas Vesicle) से जोड़ती है।

शुक्राशय - यह एक जोड़ी पतली पेशीयुक्त भित्तियो वाली पालीयुक्त (Loobed) संरचना होती है। यह पोस्टेड ग्रंथियों (Prostate Glands) के ऊपर स्थित होते हैं । शुक्राशय से एक प्रकार का चिपचिपा पदार्थ स्त्रावित होता है।

पुर:स्थ ग्रंथि - यह मूत्रमार्ग (Urethra) से मूत्राशय (Urinary Bladder) तक संबंध रहता है। इसमें लगभग दो दर्जन नलिकाएं होती है, जो मूत्रमार्ग (Urethra) में खुलती है। पुर:स्थ ग्रंथि (Prostate Glands) से एक प्रकार का द्रव स्त्रावित होता है, जिसे पुर:स्थ द्रव (Prostate Fluid) कहते हैं। यह द्रव शुक्र (Semen) को विशिष्ट गंध (Smell) प्रदान करता है।

शिश्न - शिश्न (Penis) पुरुषों का संभोग करने वाला अंग होता है। शिश्न के माध्यम से ही शुक्राणु मादा के प्रजनन तंत्र में पहुंचते हैं। शिश्न में अत्यधिक रक्त की आपूर्ति होती है । साथ - ही - साथ इसकी पेशिया भी विशिष्ट प्रकार की होती है। शिश्न (Penis) शुक्र (Semen) को शरीर से बाहर निकालकर मादा की योनि (Vagina) के भीतर तक पहुंचाता है।

मादा प्रजनन तंत्र

मादा प्रजनन तंत्र को चार भागों में स्पष्ट रूप से विभाजित किया जा सकता है -

        • अंडाशय (Ovaries)
        • अंडवाहिनिया (Fallopiam Tube)
        • गर्भाशय (Uterus)
        • योनि (Vagina)

मादा प्रजनन तंत्र

अंडाशय - प्रत्येक मादा (Female) में एक जोड़ा अंडाशय होता है। यह उदर गुहा के निचले भाग में श्रेणीगुहा (Pelvic Cavity) में दोनों और दाएं और बाएं एक - एक स्थित होते हैं। प्रत्येक अंडाशय एक अंडाकार (Oval) रचना होती है । अंडाशय (Ovary) पेरीटोनियम (Peritoneum) झील्ली द्वारा उदर (Abdomen) से सटा रहता है। अंडाशय के भीतर अंडाणुओं (Ovum) का अंडजनन (Oogenesis) द्वारा निर्माण होता है। अंडाशय का मुख्य कार्य अंडाणु (Ovum) पैदा करना है। अंडाशय से दो हार्मोन एस्ट्रोजन (Oestrogen) तथा प्रोजेस्ट्रोन (Progesterone) का स्राव (Secreation) होता है, जो ऋतुस्त्राव (Menstruation) को नियंत्रित करते हैं।

अंडवाहिनिया - अंडवाहिनि या फेलोपियन नलिका की संख्या 2 होती है, जो गर्भाशय के ऊपरी भाग में दोनों तरफ जुड़ी रहती है। प्रत्येक फेलोपियन नलिका लगभग 10 सेंटीमीटर लंबी होती है । इस नलिका का एक सिरा गर्भाशय से संबंध रहता है, तथा दूसरा सिरा अंडाशय की और अंगुलियों के समान झालर बनाता है। अंडाणु (Ovum) जब अंडाशय (Ovary) से बाहर निकलता है, तो यह अंडाणु फेलोपियन नलिका की गुहा में पहुंच जाता है। फेलोपियन नलिका से अंडाणु गर्भाशय में पहुंचता है। फेलोपियन नलिका का प्रमुख कार्य अंडाणु को पकड़ना और गर्भाशय में पहुंचाना है।

गर्भाशय - यह एक नाशपाती के समान रचना होती है, जो श्रेणीगुहा (Pelvic Cavity) में स्थित होती है । इससे ऊपर की तरफ दोनों और अर्थात - दाएं और बाएं कोण पर अंडवाहिनी (Fallopian Tube) खुलती है। इसका निचला भाग संकरा होता है , जिसे ग्रीवा (Cervix) कहते हैं। ग्रीवा आगे की ओर योनि (Vagina) में परिवर्तित हो जाती है । गर्भाशय (Uterus) का निचला छिद्र इसी में खुलता है। गर्भाशय का प्रमुख कार्य निषेचित अंडाणुओ से भ्रूण के विकास हेतु उचित स्थान प्रदान करना है । 

ध्यान दें : भ्रूण से ही बच्चे का विकास भी होता है।

योनि - यह एक नली के समान रचना होती है। यह बाहर के तल से गर्भाशय तक फैली रहती है। योनि के शरीर के बाहर खुलने वाले छिद्र को योनि द्वार (Vaginal Orifice) कहते हैं । योनि की दीवार में वल्बोरिथ्रल ग्रंथियां पाई जाती है, जिससे एक चिपचिपा द्रव निकलता है। यह द्रव संभोग योनि को चिकना बनाता है। योनि एवं मूत्र वाहिनी के द्वार के ऊपर एक छोटा - सा मटर (Pea) के दाने के जैसा उभार स्थित होता है, जिसे भग शिस्निका (Clitoris) कहते हैं। यह एक अत्यंत ही उत्तेजक अंग होता है। मैथुन के समय शिश्न से वीर्य निकलकर योनि में गिरता है तथा योनि इसे गर्भाशय में पहुंचा देती है।

अंडोत्सर्ग (ओवुलेशन) क्या है

अंडाणु के परिवर्तन के साथ-साथ गर्भाशय भी परिवर्तित होता है। परिवर्धन कि ये क्रियाएं हार्मोन द्वारा नियंत्रित होती है । 28 दिन की सक्रियता में अंडाशय (Ovary) सामान्यतः केवल एक अंडाणु (Ovum) की उत्पत्ति करता है। अंडाशय द्वारा अंडाणु की निर्मुक्ति को अंडोत्सर्ग कहते हैं।

पीरियड्स (ऋतु स्त्राव) क्या होते हैं 

अंडाणु ऋतुस्त्राव चक्र का पाया जाना प्राईमेट्स का प्रमुख लक्षण है। स्त्री का प्रजनन काल 12 से 13 वर्ष की उम्र में प्रारंभ होता है, जो 40 से 50 वर्ष की उम्र तक चलता है। इस प्रजनन काल में गर्भावस्था को छोड़कर प्रति 26 से 28 दिनों की अवधि पर गर्भाशय से रक्त (Blood) तथा इसकी आंतरिक दीवार से श्लेषम (Mucus) का स्राव होता है। यह स्राव तीन-चार दिनों तक चलता है। इसे ही रजोधर्म या मासिक चक्र या पीरियड्स या ऋतुस्त्राव चक्र (Menstruation Cycle) कहते हैं । ऋतुस्त्राव के प्रारंभ होने के 14 दिन बाद अंडोत्सर्ग होता है। यह अंडोत्सर्ग (Ovulation) की क्रिया दोनों अंडाशयो (Ovary) से बारी-बारी होती है। अंडोत्सर्ग के कुछ समय के पश्चात अंडाणु अंडवाहिनी में पहुंच जाता है और 15 से 19 दिन तक इसमें रहता है। इसी बीच यदि स्त्री संभोग करें, तो यह अंडाणु निषेचित (Fertilized) होकर गर्भाशय में चला जाता है, अन्यथा वह अगले ऋतुस्त्राव में बाहर निकल जाता है। लड़कियों में मासिक धर्म या ऋतुस्त्राव चक्र प्रथम बार 12 से 13 वर्ष की उम्र में प्रारंभ होता है, इसे मेनार्की (Menarche) कहते हैं। अंडोत्सर्ग के पश्चात अंडाशय की पुटिका (Follicle) पीले रंग की हो जाती है। अब इस पुटिका को कॉरपस लुटियम (Corpus Luteum) कहते हैं। कॉरपस लुटियम द्वारा एक हार्मोन का स्त्राव होता है जिसे प्रोजेस्ट्रोन (Progesterone) कहते हैं।

मनुष्य प्रजनन कैसे करते हैं

मानव के प्रजनन में 3 अवस्थाएं होती हैं -

        • युग्मक जनन (Gemetogenesis)
        • निषेचन (Fertilization)
        • भ्रूण विकास (Embryonic Development)

युग्मक जनन - वृषण (Testes) एवं अंडाशयो (Ovaries) में युग्मको (Gemets) के निर्माण की प्रक्रिया को युग्मक जनन (Gametogenesis) कहते हैं। युग्मको का निर्माण वृषण तथा अंडाशय की जनन कोशिकाओं में अर्धसूत्री विभाजन द्वारा होता है। वृषण में शुक्राणुओं (Sperms) का निर्माण शुक्रजनन (Spermatogensis) तथा अंडाणु (Ovum) का अंडाशय में निर्माण अंडजनन (Oogenesis) कहलाता है।

निषेचन - नर युग्मक (शुक्राणु) एवं मादा युग्मक (अंडाणु) के आपस में सम्मिलन से युग्मनज (Zygote) बनने की क्रिया को निषेचन (Fetilization) कहते हैं। मनुष्य में अंत: निषेचन (Internal Fertilization) पाया जाता है अतः मनुष्य में निषेचन की क्रिया मादा की अंडवाहिनी (Fallopian Tube) में संपूर्ण होती है जबकि इस क्रिया में नर युग्मक का केवल केंद्रक भाग लेता है, लेकिन मादा में संपूर्ण मादा युग्मक इसमें भाग लेता है।

भ्रूण विकास - निषेचन क्रिया के बाद बना युग्मनज (Zygote) त्रिव्रता से समसूत्री विभाजनो द्वारा विभाजित होने लगता है, और अंततः गर्भाशय में एक पूर्ण विकसित शिशु को स्थापित करता है। निषेचन के लगभग 10 सप्ताह तक के विकसित युग्मनज को भ्रूण (Embryo) तथा युग्मनज में होने वाले विभिन्न कर्मीक परिवर्तनो को भ्रूणीय विकास कहते हैं । भ्रूण (Embryo) 9 वे माह में जन्म के लिए तैयार हो जाता है। भ्रूण का पोषण जरायू (Chorin) एम्नियान एवं अपरा (Placenta) द्वारा होता है। मनुष्य में गर्भाधान काल (Geatation Period) 280 दिनों का होता है । इसके पश्चात प्रसव (Delivery) द्वारा शिशु मादा के शरीर से बाहर आ जाता है।

प्रमुख बिंदु
  • सहेली एक गर्भनिरोधक गोली है।
  • नर में नसबंदी - वासेक्टोमी
  • मादा में नसबंदी - ट्यूबल लिगेशन
  • गर्भाशय में पल रहे बच्चे को पोषण अपरा/प्लेसेंटा कहते हैं।
  • भ्रूण में हृदय धड़कन 180 तथा शिशुओं में 120 बार होती है, वही सामान्य व्यक्ति में 72 बार एवं वृद्ध में 60 बार तथा दौड़ने में 180 तक हो जाती है।
  • ऑक्सीटोसिन हार्मोन को लव हार्मोन कहा जाता है यह शिशु एवं माता में लगाव व प्रेम उत्पन्न करता है।

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